वन संरक्षण में धार्मिक विश्वासों, लोक-परम्पराओं एवं सामुदायिक भागीदारी की भूमिका

Authors

  • सरोज गोठवाल वन संरक्षण में धार्मिक विश्वासों, लोक-परम्पराओं एवं सामुदायिक भागीदारी की भूमिका

DOI:

https://doi.org/10.5281/zenodo.23465598

Keywords:

वन संरक्षण, धार्मिक विश्वास, लोक-परम्पराएँ, सामुदायिक भागीदारी, पवित्र उपवन, ओरण, विश्नोई समुदाय, जैव विविधता।

Abstract

वन संरक्षण केवल प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध समाज की सांस्कृतिक मान्यताओं, धार्मिक आस्थाओं, लोक-परम्पराओं और सामुदायिक जीवन से भी है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पवित्र उपवनों, देववनों, ओरणों, वृक्ष-पूजा, जलस्रोतों की रक्षा तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग से जुड़े नियमों ने अनेक स्थानों पर वनस्पति और जैव विविधता के संरक्षण में योगदान दिया है। राजस्थान में ओरण परंपरा और विश्नोई समुदाय की प्रकृति-संरक्षण संबंधी मान्यताएँ इस संबंध के उल्लेखनीय उदाहरण हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य धार्मिक विश्वासों, लोक-परम्पराओं तथा सामुदायिक भागीदारी की वन संरक्षण में भूमिका का विश्लेषण करना, उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को समझना तथा आधुनिक वन प्रबंधन में इनके समावेश की संभावनाओं पर विचार करना है। अध्ययन वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक है तथा द्वितीयक स्रोतों, नीतिगत दस्तावेजों और ऐतिहासिक उदाहरणों पर आधारित है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ संरक्षण के लिए सामाजिक प्रेरणा उत्पन्न कर सकती हैं, जबकि समुदाय की भागीदारी संरक्षण को स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ती है। तथापि, इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता के लिए वैज्ञानिक मूल्यांकन, समावेशी निर्णय प्रक्रिया, कानूनी समर्थन और आजीविका संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रखना अनिवार्य है।

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Published

2026-10-19

How to Cite

सरोज गोठवाल. (2024). वन संरक्षण में धार्मिक विश्वासों, लोक-परम्पराओं एवं सामुदायिक भागीदारी की भूमिका International Journal of Management, Engineering and Social Sciences,5(1), 205-208.
https://doi.org/10.5281/zenodo.23465598

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